पाक में बसंत पंचमीः घरों में मेले सा नजारा, रातभर जश्न

बसंत पंचमी का पर्व भारत ही नहीं, पाकिस्तान में भी धूमधाम से मनाया जाता
है। यही कारण है कि इन दिनों पेशावर के बाजारों में रौनक बिखरी है। लोग बच्चों को
नए कपड़े दिलाने और ड्रायफ्रूट्स
, पीले चावल को खरीदी में मशगूल हैं। पेशावर के
हिंदू नेता हारून सरब दयाल कहते हैं कि पेशावर समेत देश के अन्य हिस्सों में
हफ्तों पहले बसंत पंचमी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बच्चे। रंगीन
, तो बड़े-बुजुर्ग और
महिलाएं पीले रंग के कपड़े पहनते हैं। लजीज – व्यंजन बनाए जाते हैं। इनमें पीले
चावल की खीर प्रमुख है। दरअसल
, 3 पाकिस्तान के खैबर पख्तुनवा प्रांत के पेशावर और
पंजाब प्रांत के लिए बसंत पंचमी प्रमुख पर्वो में से एक है। 


पाक में बसंत पंचमीः घरों में मेले सा नजारा, रातभर जश्न


1990 के दशक में बढ़ते के
आतंकवाद और धार्मिक कट्टरता ने यह इन रंगों को फीका कर दिया। हालांकि उस वक्त के
साथ पहले जैसा सौहार्द दिखने लगा है। पेशावर हिंदुओं के सबसे पुराने शहरों में से
है। यहां
70 हजार से ज्यादा हिंदू रहते हैं। प्राचीन मंदिर भी हैं। बसंत पंचमी पर
मंदिरों में खास रौनक रहती है। पेशावर के प्राचीन मंदिर के पुजारी शकील कुमार
बताते हैं
, ‘हिंद समुदाय पिस्ता, बादाम, काजू, मूंगफली के की बॉक्स बनाते हैं। खास हक्वा मिठाई
में बनाते हैं और पड़ोसियों को तोहफे के में देते हैं।
पेशावर सदर के जुबैर लौ इलाही बताते हैं
कि बसंत पंचमी पर मित्रों के घर जाते हैं। भोजन करते हैं और रात भर चलने वाले
उत्सव में शामिल होते हैं। मेले जैसा नजारा होता है। हालांकि दुर्भाग्य से
कट्टरवाद की वजह से अब आयोजन घरों में सिमटता जा रहा है। सरकार को चाहिए कि वह
अच्छे दिन लौटाए। बसंत पंचमी जैसे पर्व इस वातावरण को दोबारा बनाने में बड़ी
भूमिका निभा सकते हैं। लाहौर के शिक्षक खेत कुमार बताते हैं कि डिनर पार्टी
,
डांसिंग प्रोग्राम
पहले की तरह होते हैं। घरों में ज्ञान
, कला और संगीत की देवी की विशेष पूजा करते हैं। वे
सरकार और सिविल सोसाइटी के आयोजकों से मांग करते हैं कि पतंगबाजी जैसे उत्सव फिर
शुरू किए जाएं ताकि अल्पसंख्यक आबादी खुलकर अनुष्ठान कर सके। सिंध प्रांत में इस
मौके पर पारंपरिक शो होते हैं। सिंध वो इलाका है
, जहां ज्यादातर आबादी गैर मुस्लिम है।

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